Monday, April 20, 2015

मुहब्बत के शहर की तलाश है |

मुहब्बत से देखे हमें उस नज़र की तलाशहै |
बीत जाए ज़िन्दगी बस हमसफ़र की तलाश है ||

हैं मकां तो लाखों-हजारों जहाँ में ,मगर हमें,
हो रिश्तों की बुनियाद पे एक घर की तलाश है |

बस जिंदा हैं जिस्म ,अरसा हुआ रूह को मरे हुए
ले जाए जो हमको खुदा तक ,उसी सफ़र की तलाश है |

खो गए  हैं जो गीत मिलते नहीं अब कही हमें ,
पेड़ पर पंछी फिर गाएं,उस सहर की तलाश है |

कौन जाने आई कहाँ से ,बसे है कहाँ ,तभी,
हर किसी को इस मुहब्बत के शहर की तलाश है |

आस्तां  पे  बैठे  क्यों  है  भला  इन्तज़ार  में ,
जब पता है ,उनको किसी और दर की तलाश है |

बहुत जागे हैं रात -दिन मुहब्बत में "नज़ील" हम ,
अब  हमें  सोने  के  लिए  इक  कब्र  की तलाश है

Thursday, April 9, 2015

अल्लाह जो लिखे किस्मत की किताब में |

अल्लाह जो लिखे किस्मत की किताब में |
कोई  कमी  न  रहे  कभी  उस  हिसाब में ||

माना कि बहुत दिलकश अदा है जनाब में |
मालूम है  उसे  हम  भी  हैं  शबाब  में

ख़त  है  लिखा  उसे   इजहारे-इश्क  में पर ,
मै  जानता  हूँ  जो  वो  लिखेंगे जवाब  में||

उनसे  जुदा  हुआ , जिंदगी ही बिखर गई ,
बस   ढूंढता  रहा   उनको   मै  शराब  में ||

पाया   क्या  ,क्या   खोया  है   इश्क   में.
उलझा  रहूँ  इसी  अनसुलझे  हिसाब  में |

उसने  दिया  कभी  नजराना -ए- उंस मुझे,
है आज भी महक उस सूखे गुलाब में ||

वादा  करो  अगर  मुझसे  तो "नजील"मैं,
सोया   रहूँ  उम्र  भर  तेरे  ख्वाब  में

Wednesday, April 8, 2015

बहुत कुछ दांव पे लगाया है ॥

बड़ा मुश्किल उसे मनाया है ॥ 
बहुत कुछ दांव पे लगाया है ॥ 


किसे कहते कि बेवफा है वो ,
हँसा हम पे जिसे बताया है ॥ 


बसा दिल-ओ-दिमाग में वो ही ,
अचानक सामने जो आया है ॥ 


लगे ऐसा हमें खुदा ने उसे ,
हमारे के लिए बनाया है ॥ 


हुआ है एहसास जन्नत का , 
जो माँ ने गोद में सुलाया है ॥ 


कहाँ होशो-हवास की बातें ,
किसी पे जब शबाब आया है ॥ 


लगे है वो पवित्र गंगा सा ,
करिंदा जो पसीने से नहाया है ॥

Thursday, April 2, 2015

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥
ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर 

मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥
घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर

भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,
वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर ।

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो  फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई  इसको  मुहब्बत  की  लहर ॥
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