Wednesday, February 15, 2012

जब हो गए हैं तेरे राजदां हम

मालूम न हुआ कब हुए जवां हम ||
पार कर गए बचपन की आस्तां हम ||


तब भी वालिदा को लगे तिफ्ल ही  ,
करके तरक्की छू लें आसमां हम ||
 

अब ना है कुछ छिपाने की जरूरत ,
जब हो गए हैं तेरे राजदां हम ||
 

उनसे दूर है तो क्या हुआ फिर ,
उनको आज भी भूले हैं
कहाँ हम ||
 

गुजरें है "नजील" उनकी गली से ,
अक्सर देकर इश्क का इम्तिहां हम ||

10 comments:

  1. Replies
    1. धन्यवाद आदरनीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) जी हार्दिक आभार ..:)

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  2. Replies
    1. धन्यवाद आदरणीया रीना मौर्या जी हार्दिक आभार ..:)

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  3. कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल .बहुत अच्छे ज़नाब .क्या बात है

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    1. धन्यवाद आदरणीय वीरू भाई जी हार्दिक आभार ..:)

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  4. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-791:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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    1. धन्यवाद आदरणीय दिलबाग जी हार्दिक आभार ..:)

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  5. अच्छी ग़ज़ल कहता है क्या .........

    और कहते रहिये ....
    सुनने वाले तैयार हैं.....

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